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mahabharat 13.55.28: तब राजा ने निःसंकोच होकर तपस्वी से कहा - 'बहुत अच्छा, हे प्रभु! क्या क्रीड़ा के लिए रथ तैयार किया जाना चाहिए या युद्ध में काम आने वाला रथ?'॥28॥   |   mahabharat अध्याय 13.55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.55.28 
तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम्।
क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथ:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तब राजा ने निःसंकोच होकर तपस्वी से कहा - 'बहुत अच्छा, हे प्रभु! क्या क्रीड़ा के लिए रथ तैयार किया जाना चाहिए या युद्ध में काम आने वाला रथ?'॥28॥
 
Then the king without any doubt said to the ascetic, 'Very good, O Lord! Should a chariot be prepared for sports or a chariot to be used in war?'॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)