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mahabharat 13.50.46: संसार के प्राणी नाना प्रकार के आचार-व्यवहार में लगे रहते हैं, और नाना प्रकार के कर्मों में लगे रहते हैं; अतः आचरण के अतिरिक्त ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो जन्म के रहस्य को स्पष्ट रूप से प्रकट कर सके ॥ 46॥   |   mahabharat अध्याय 13.50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  13.50.46 
नानावृत्तेषु भूतेषु नानाकर्मरतेषु च।
जन्मवृत्तसमं लोके सुश्लिष्टं न विरज्यते॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
संसार के प्राणी नाना प्रकार के आचार-व्यवहार में लगे रहते हैं, और नाना प्रकार के कर्मों में लगे रहते हैं; अतः आचरण के अतिरिक्त ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो जन्म के रहस्य को स्पष्ट रूप से प्रकट कर सके ॥ 46॥
 
The creatures of the world are engaged in various kinds of conduct and behavior, and are engaged in various kinds of actions; hence, apart from behavior, there is nothing that can clearly reveal the mystery of birth. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)