श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.45.14 
यदि त्वहं त्वां दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम।
शपेयं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस कृत्य में तुम्हारा दुराचरण देखता तो क्रोधित होकर तुम्हें शाप दे देता और ऐसा करके मेरे मन में कोई दूसरा विचार या पश्चाताप न होता॥14॥
 
Dwijshreshtha! If I had seen your misconduct in this act, I would have got angry and cursed you and by doing so I would not have had any other thought or remorse in my mind. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)