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mahabharat 13.43.8: तुम्हारा चिन्तन करने से मेरे हृदय में जो काम उत्पन्न हुआ है, वह मुझे अत्यन्त दुःख दे रहा है। इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ। हे सुन्दरी! अब विलम्ब न करो, समय बीतता जा रहा है।॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.43.8 
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्संकल्पभवेन ह।
तत् सम्प्राप्तं हि मां सुभ्रु पुरा कालोऽतिवर्तते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा चिन्तन करने से मेरे हृदय में जो काम उत्पन्न हुआ है, वह मुझे अत्यन्त दुःख दे रहा है। इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ। हे सुन्दरी! अब विलम्ब न करो, समय बीतता जा रहा है।॥8॥
 
The lust that has arisen in my heart by thinking of you is causing me great pain. That is why I have come to you. Beautiful lady! Do not delay now, time is passing by.'॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)