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mahabharat 13.43.18-19h: जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, वैसे ही वह अपनी गुरुपत्नी के शरीर में प्रतिबिम्बित हो गया। हे प्रभु! जैसे ही इन्द्र ने घोर तपस्या करने वाले महामुनि को देखा, वह शाप के भय से काँपने लगा। 18 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  13.43.18-19h 
प्रतिबिम्बमिवादर्शे गुरुपत्न्या: शरीरगम्।
स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दर:॥ १८॥
प्रावेपत सुसंत्रस्त: शापभीतस्तदा विभो।
 
 
अनुवाद
जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, वैसे ही वह अपनी गुरुपत्नी के शरीर में प्रतिबिम्बित हो गया। हे प्रभु! जैसे ही इन्द्र ने घोर तपस्या करने वाले महामुनि को देखा, वह शाप के भय से काँपने लगा। 18 1/2॥
 
Just as a reflection is seen in a mirror, similarly he was reflected in the body of his Guru's wife. Lord! As soon as Indra saw the great sage with severe penance, he started trembling with fear of curse. 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)