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mahabharat 13.43.16-17: उनके उपरोक्त वचन सुनकर वहाँ खड़े हुए इन्द्र हृदय में अत्यन्त दुःखी हो गए। प्रजानाथ! उनके मन की व्याकुलता तथा भाव-परिवर्तन देखकर सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने दिव्य दृष्टि से उनकी ओर देखा। फिर उनकी दृष्टि उनके शरीर के भीतर स्थित महामुनि पर पड़ी। 16-17।   |   mahabharat अध्याय 13.43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  13.43.16-17 
पुरन्दरश्च तत्रस्थो बभूव विमना भृशम्।
स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशाम्पते॥ १६॥
अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा।
स ददर्श मुनिं तस्या: शरीरान्तरगोचरम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उनके उपरोक्त वचन सुनकर वहाँ खड़े हुए इन्द्र हृदय में अत्यन्त दुःखी हो गए। प्रजानाथ! उनके मन की व्याकुलता तथा भाव-परिवर्तन देखकर सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने दिव्य दृष्टि से उनकी ओर देखा। फिर उनकी दृष्टि उनके शरीर के भीतर स्थित महामुनि पर पड़ी। 16-17।
 
Indra, who was standing there, became very sad in his heart after hearing his above words. Prajanath! Observing his mental disturbance and change in his expression, the thousand-eyed Devraj Indra looked at him with divine sight. Then his eyes fell on the great sage inside his body. 16-17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)