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mahabharat 13.40.14: प्रभु! हम स्त्रियों में सबसे बड़ा पाप यही है कि हम पापी से पापी पुरुष को भी बिना लज्जा के स्वीकार कर लेती हैं॥14॥   |   mahabharat अध्याय 13.40: पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 40: पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.40.14 
असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो।
पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! हम स्त्रियों में सबसे बड़ा पाप यही है कि हम पापी से पापी पुरुष को भी बिना लज्जा के स्वीकार कर लेती हैं॥14॥
 
Prabhu! The biggest sin among us women is that we accept even the most sinful men without any shame. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)