प्रतिलभ्य च सा संज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च।
उवाच भार्या भर्तारं गाधेयी भार्गवर्षभम्॥ ४३॥
प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदां वर।
प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात् क्षत्रिय: सुत:॥ ४४॥
अनुवाद
थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तो गाधि कन्या ने अपने पति भृगुभूषण ऋचीक के चरणों में सिर झुकाकर आदरपूर्वक कहा - 'हे ब्रह्म के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपकी दया और आशीर्वाद की याचना करती हूँ। आप इतनी कृपा करें कि मेरे गर्भ से क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो।'
After a while when she regained consciousness, the daughter of Gadhi bowed her head at the feet of her husband Bhrigubhushan Richik and said with respect - 'O great Brahmarshi among the knowers of Brahma! I am your wife, so I beg for your mercy and blessings. Please be kind enough so that a Kshatriya son is not born from my womb.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥