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mahabharat 13.38.4: शम्बरासुर ने कहा, "मैं ब्राह्मणों में कभी दोष नहीं देखता। मैं उनकी राय को अपनी राय मानता हूँ और जो ब्राह्मण मुझे शास्त्र समझाते हैं, मैं उनका सदैव आदर करता हूँ। मैं उन्हें यथासंभव सुख देने का प्रयास करता हूँ।"   |   mahabharat अध्याय 13.38: ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 38: ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.38.4 
शम्बर उवाच
नासूयामि यदा विप्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम्।
शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
शम्बरासुर ने कहा, "मैं ब्राह्मणों में कभी दोष नहीं देखता। मैं उनकी राय को अपनी राय मानता हूँ और जो ब्राह्मण मुझे शास्त्र समझाते हैं, मैं उनका सदैव आदर करता हूँ। मैं उन्हें यथासंभव सुख देने का प्रयास करता हूँ।"
 
Shambarasur said, "I never find fault with Brahmins. I consider their opinion as my own and I always respect the Brahmins who explain the scriptures to me. I try to give them as much happiness as possible."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)