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mahabharat 13.35.19: जो ब्राह्मण दूसरों की निन्दा और प्रशंसा करने में कुशल हैं तथा दूसरों की कीर्ति और अपकीर्ति बढ़ाने में सदैव तत्पर रहते हैं, वे उन लोगों पर क्रोधित होते हैं जो उनसे सदैव द्वेष रखते हैं॥19॥   |   mahabharat अध्याय 13.35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.35.19 
निन्दाप्रशंसाकुशला: कीर्त्यकीर्तिपरायणा:।
परिकुप्यन्ति ते राजन् सततं द्विषतां द्विजा:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण दूसरों की निन्दा और प्रशंसा करने में कुशल हैं तथा दूसरों की कीर्ति और अपकीर्ति बढ़ाने में सदैव तत्पर रहते हैं, वे उन लोगों पर क्रोधित होते हैं जो उनसे सदैव द्वेष रखते हैं॥19॥
 
The Brahmins, who are adept in criticising and praising others and are always ready to enhance the fame and infamy of others, become angry with those who always bear animosity towards them.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)