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श्लोक 13.34.10  |
श्येन उवाच
ममैतद् विहितं भक्ष्यं न राजंस्त्रातुमर्हसि।
अतिक्रान्तं च प्राप्तं च प्रयत्नाच्चोपपादितम्॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| इतने में ही गरुड़ भी वहाँ आ पहुँचा और बोला- हे राजन! इस कबूतर को विधाता ने मेरा आहार बनाया है। आपको इसकी रक्षा नहीं करनी चाहिए। इसका प्राण तो पहले ही जा चुका है; क्योंकि अब यह मुझे मिला है। मैंने इसे बड़े परिश्रम से प्राप्त किया है॥10॥ |
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| Meanwhile the eagle also reached there and said- O King! The Creator has appointed this pigeon as my food. You should not protect it. Its life is already gone; because now I have got it. I have obtained it with great effort.॥ 10॥ |
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