श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 34: राजर्षि वृषदर्भ (या उशीनर)-के द्वारा शरणागत कपोतकी रक्षा तथा उस पुण्यके प्रभावसे अक्षयलोककी प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.34.10 
श्येन उवाच
ममैतद् विहितं भक्ष्यं न राजंस्त्रातुमर्हसि।
अतिक्रान्तं च प्राप्तं च प्रयत्नाच्चोपपादितम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
इतने में ही गरुड़ भी वहाँ आ पहुँचा और बोला- हे राजन! इस कबूतर को विधाता ने मेरा आहार बनाया है। आपको इसकी रक्षा नहीं करनी चाहिए। इसका प्राण तो पहले ही जा चुका है; क्योंकि अब यह मुझे मिला है। मैंने इसे बड़े परिश्रम से प्राप्त किया है॥10॥
 
Meanwhile the eagle also reached there and said- O King! The Creator has appointed this pigeon as my food. You should not protect it. Its life is already gone; because now I have got it. I have obtained it with great effort.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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