श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 30: ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका आग्रह छोड़कर दूसरा वर माँगनेके लिये इन्द्रका मतङ्गको समझाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.30.8 
ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि।
शूद्रयोनावपि ततो बहुश: परिवर्तते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
एक हजार वर्ष के पश्चात् वह चाण्डाल या पुलक शूद्र के रूप में जन्म लेता है और अनेक जन्मों तक उस लोक में घूमता रहता है ॥8॥
 
After a thousand years, he is born as a Chandala or a Pulakas Shudra and continues to roam around in that world for several births. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)