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mahabharat 13.28.98: कदाचित् सभी प्रकार के प्रयत्न करने पर मेरु गिरि के पाषाण कण और समुद्र की जलकणिकाओं की गणना की जा सके; परन्तु यहाँ गंगाजल के गुणों का वर्णन और गणना करना कदापि संभव नहीं है ॥98॥   |   mahabharat अध्याय 13.28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.28.98 
मेरो: समुद्रस्य च सर्वयत्नै:
संख्योपलानामुदकस्य वापि।
शक्यं वक्तुं नेह गङ्गाजलानां
गुणाख्यानं परिमातुं तथैव॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
कदाचित् सभी प्रकार के प्रयत्न करने पर मेरु गिरि के पाषाण कण और समुद्र की जलकणिकाओं की गणना की जा सके; परन्तु यहाँ गंगाजल के गुणों का वर्णन और गणना करना कदापि संभव नहीं है ॥98॥
 
Perhaps by making all kinds of efforts, the stone particles of Meru Giri and the water droplets of the ocean can be counted; But it is never possible to describe and calculate the properties of Ganga water here. 98॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)