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mahabharat 13.28.86: गंगाजी जगत का उद्धार करने में समर्थ हैं। वे पृथ्वीगर्भ की माता 'पृष्णि' के समान विशाल हैं, श्रेष्ठ हैं, शुभ हैं, गुणों से परिपूर्ण हैं, भगवान शिव द्वारा सिर पर धारण किए जाने के कारण सौभाग्यवती हैं और भक्तों पर अत्यंत प्रसन्न होती हैं। इतना ही नहीं, वे पापों का नाश करने वाली कालरात्रि के समान हैं और समस्त जीवों की शरणस्थली हैं। जिन लोगों ने गंगाजी की शरण ली है, वे स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं। 86।   |   mahabharat अध्याय 13.28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.28.86 
दक्षां पृश्निं बृहतीं विप्रकृष्टां
शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम्।
विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां
गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
गंगाजी जगत का उद्धार करने में समर्थ हैं। वे पृथ्वीगर्भ की माता 'पृष्णि' के समान विशाल हैं, श्रेष्ठ हैं, शुभ हैं, गुणों से परिपूर्ण हैं, भगवान शिव द्वारा सिर पर धारण किए जाने के कारण सौभाग्यवती हैं और भक्तों पर अत्यंत प्रसन्न होती हैं। इतना ही नहीं, वे पापों का नाश करने वाली कालरात्रि के समान हैं और समस्त जीवों की शरणस्थली हैं। जिन लोगों ने गंगाजी की शरण ली है, वे स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं। 86।
 
Ganga is capable of uplifting the world. God is like 'Prishni', the mother of Prishnigarbha, is huge, is the best, is auspicious, is full of virtues, is fortunate due to being held on the head by Lord Shiva and is very pleased with the devotees. Not only this, she is like Kaalratri for destroying sins and is the refuge of all living beings. Those who have taken refuge in Gangaji have reached heaven. 86.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)