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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन
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श्लोक 44
श्लोक
13.28.44
भवन्ति निर्विषा: सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात्।
गङ्गाया दर्शनात् तद्वत् सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ४४॥
अनुवाद
जैसे गरुड़ को देखकर सभी साँपों का विष उतर जाता है, वैसे ही गंगाजी के दर्शन मात्र से मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 44॥
Just as all snakes lose their venom upon seeing Garuda, similarly a man is relieved of all his sins simply by seeing the Ganges. ॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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