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mahabharat 13.27.49: जो हिंसा का त्याग करके सत्यवादी होकर विन्ध्याचल में अपने शरीर को कष्ट देता है और विनयपूर्वक तपस्या का आश्रय लेता है, वह एक महीने के भीतर सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ 49॥   |   mahabharat अध्याय 13.27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.27.49 
विन्ध्ये संताप्य चात्मानं सत्यसंधस्त्वहिंसक:।
विनयात्तप आस्थाय मासेनैकेन सिध्यति॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जो हिंसा का त्याग करके सत्यवादी होकर विन्ध्याचल में अपने शरीर को कष्ट देता है और विनयपूर्वक तपस्या का आश्रय लेता है, वह एक महीने के भीतर सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ 49॥
 
He who, renouncing violence and being truthful, tortures his body at Vindhyachal and takes refuge in austerity with humility, attains success within a month. ॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)