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mahabharat 13.27.45: जो समस्त प्रकार की हिंसा का त्याग करके जितेन्द्रिय भाव से आवर्तानंद और महानंद तीर्थ का सेवन करता है, उसी की स्वर्ग रूपी नंदनवन में अप्सराएँ सेवा करती हैं ॥45॥   |   mahabharat अध्याय 13.27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.27.45 
पुनरावर्तनन्दां च महानन्दां च सेव्य वै।
नन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसक:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जो समस्त प्रकार की हिंसा का त्याग करके जितेन्द्रिय भाव से आवर्तानंद और महानंद तीर्थ का सेवन करता है, उसी की स्वर्ग रूपी नंदनवन में अप्सराएँ सेवा करती हैं ॥45॥
 
Apsaras serve him in the heavenly Nandanvan, who, renouncing all forms of violence, consumes Avartananda and Mahananda Tirtha with Jitendriya Bhava. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)