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mahabharat 13.25.8: जो दूसरों का छोड़ा हुआ हो, जिसमें से किसी ने खाया हो और जो देवताओं, पितरों, अतिथियों, बालकों आदि को अर्पित किए बिना ही खाया गया हो, वह अन्न देवताओं और पितरों के कर्तव्य कर्मों में सदैव राक्षसों का भाग माना जाता है ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.25.8 
परोच्छिष्टं च यद् भुक्तं परिभुक्तं च यद् भवेत्।
दैवे पित्र्ये च सततं तं भागं रक्षसां विदु:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो दूसरों का छोड़ा हुआ हो, जिसमें से किसी ने खाया हो और जो देवताओं, पितरों, अतिथियों, बालकों आदि को अर्पित किए बिना ही खाया गया हो, वह अन्न देवताओं और पितरों के कर्तव्य कर्मों में सदैव राक्षसों का भाग माना जाता है ॥8॥
 
That which has been left over by others, from which someone has eaten and which has been consumed without offering it to the gods, forefathers, guests, children etc., that food is always considered to be the share of the demons in the duties of the gods and ancestors. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)