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mahabharat 13.25.45: हे राजन! जो ब्राह्मण अपने घर में अपवित्र होकर भी लोभ के कारण दूसरे ब्राह्मण के यहाँ श्राद्ध का भोजन जान-बूझकर ग्रहण करता है, वह भी गौ के नाम पर झूठी शपथ लेने का पाप करता है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 13.25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.25.45 
आशौचो ब्राह्मणो राजन् योऽश्नीयाद् ब्राह्मणादिषु।
ज्ञानपूर्वमथो लोभात् तस्याधर्मो गवानृतम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जो ब्राह्मण अपने घर में अपवित्र होकर भी लोभ के कारण दूसरे ब्राह्मण के यहाँ श्राद्ध का भोजन जान-बूझकर ग्रहण करता है, वह भी गौ के नाम पर झूठी शपथ लेने का पाप करता है ॥ 45॥
 
O King! A Brahmin who, despite being impure in his own house, out of greed knowingly accepts food offered as part of a Shraddha ceremony at another Brahmin's place, also commits the sin of taking a false oath in the name of a cow. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)