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mahabharat 13.25.41: अब दान देने वाले और दान लेने वाले के धर्म और अधर्म का वर्णन सुनो। झूठ बोलकर ब्राह्मण जो पाप या अधर्म करता है, वह क्षत्रिय से चार गुना और वैश्य से आठ गुना अधिक होता है।   |   mahabharat अध्याय 13.25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.25.41 
दातु: प्रतिग्रहीतुश्च धर्माधर्माविमौ शृणु।
ब्राह्मणस्यानृतेऽधर्म: प्रोक्त: पातकसंज्ञित:।
चतुर्गुण: क्षत्रियस्य वैश्यस्याष्टगुण: स्मृत:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अब दान देने वाले और दान लेने वाले के धर्म और अधर्म का वर्णन सुनो। झूठ बोलकर ब्राह्मण जो पाप या अधर्म करता है, वह क्षत्रिय से चार गुना और वैश्य से आठ गुना अधिक होता है।
 
Now listen to the description of the Dharma and Dharma of the person who gives alms and the one who receives alms. The sin or adharma that a Brahmin commits by telling a lie is four times more than that committed by a Kshatriya and eight times more by a Vaishya. 41.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)