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mahabharat 13.25.29: जो अभिमान से रहित है, व्यर्थ विवाद नहीं करता, संपर्क स्थापित करने में समर्थ है तथा घर से भिक्षा लेकर जीविका चलाता है, वही ब्राह्मण निमंत्रण पाने का अधिकारी है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 13.25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  13.25.29 
अकल्कको ह्यतर्कश्च ब्राह्मणो भरतर्षभ।
संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन् केतनक्षम:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जो अभिमान से रहित है, व्यर्थ विवाद नहीं करता, संपर्क स्थापित करने में समर्थ है तथा घर से भिक्षा लेकर जीविका चलाता है, वही ब्राह्मण निमंत्रण पाने का अधिकारी है ॥29॥
 
Bharatshrestha! The one who is free from pride, does not argue unnecessarily and is able to establish contacts and earns his living by taking alms from home, he is entitled to receive the Brahmin invitation. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)