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mahabharat 13.24.33: भीष्मजी बोले - राजन! जो ब्राह्मण क्रोध से रहित, धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और इन्द्रियों को वश में करने में तत्पर हों, ऐसे ब्राह्मणों को श्रेष्ठ समझना चाहिए और उन्हें दान देने से महान फल की प्राप्ति होती है (अतः श्राद्ध में उन्हीं को भोजन कराना चाहिए)॥33॥   |   mahabharat अध्याय 13.24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.24.33 
भीष्म उवाच
अक्रोधना धर्मपरा: सत्यनित्या दमे रता:।
तादृशा: साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - राजन! जो ब्राह्मण क्रोध से रहित, धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और इन्द्रियों को वश में करने में तत्पर हों, ऐसे ब्राह्मणों को श्रेष्ठ समझना चाहिए और उन्हें दान देने से महान फल की प्राप्ति होती है (अतः श्राद्ध में उन्हीं को भोजन कराना चाहिए)॥33॥
 
Bhishmaji said – King! Those Brahmins who are free from anger, devout, truthful and ready to control the senses, such Brahmins should be considered the best and by giving donations to them, one gets great results (hence, only they should be offered food in Shraddha). 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)