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युधिष्ठिर उवाच
श्रद्धया परया पूतो य: प्रयच्छेद् द्विजातये।
हव्यं कव्यं तथा दानं को दोष: स्यात् पितामह॥ ३॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, 'पितामह! जो मनुष्य केवल अपनी उत्तम श्रद्धा से ही पवित्र है और ब्राह्मण को हवि आदि देता है, उसे अन्य किसी प्रकार की पवित्रता के अभाव से कौन-सा पाप लगता है?'
Yudhishthira asked, 'Grandfather! One who is pure only by his great faith and gives oblations and other things to a Brahmin, what sin does he incur due to the lack of any other kind of purity?'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥