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युधिष्ठिर उवाच
यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हवि:।
दत्तं ब्राह्मणकामाय कथं तत् सुकृतं भवेत्॥ १६॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण श्राद्ध में दिया गया अन्न खाते हैं, तो फिर कुलीन ब्राह्मण की इच्छा से उन्हें दिया गया दान कैसे सफल हो सकता है?"
Yudhishthira asked, "Grandfather! If the brahmins who have observed the vow of celibacy eat the food offered during the Shraddha ceremony, then how can the donation given to them with the desire of a noble brahmin be successful?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥