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मार्कण्डेय उवाच
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्।
नाभिजानामि यद्यस्य सत्यस्यार्धमवाप्नुयात्॥ १४॥
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं, "यदि तराजू के एक पलड़े में एक हजार अश्वमेध यज्ञ और दूसरे में सत्य तौला जाए, तो कौन जानता है कि वे सभी अश्वमेध यज्ञ इस सत्य के आधे के बराबर भी होंगे या नहीं?"
Mārkaṇḍeyā says, "If a thousand Ashwamedha sacrifices are weighed in one pan of the scale and truth in the other, then who knows whether all those Ashwamedha sacrifices will be equal to even half of this truth or not?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥