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mahabharat 13.24.13: अग्नि कहते हैं - जो ब्राह्मण विद्याध्ययन करके अपने को बड़ा विद्वान् समझता है और अपनी विद्या पर गर्व करता है, तथा जो अपने ज्ञान के बल से दूसरों की प्रतिष्ठा को नष्ट करता है, वह धर्म से च्युत हो जाता है और सत्य का पालन नहीं करता; इसलिए वह नाशवान लोकों को प्राप्त होता है ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 13.24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.24.13 
अग्निरुवाच
अधीयान: पण्डितं मन्यमानो
यो विद्यया हन्ति यश: परेषाम्।
प्रभ्रश्यतेऽसौ चरते न सत्यं
लोकास्तस्य ह्यन्तवन्तो भवन्ति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
अग्नि कहते हैं - जो ब्राह्मण विद्याध्ययन करके अपने को बड़ा विद्वान् समझता है और अपनी विद्या पर गर्व करता है, तथा जो अपने ज्ञान के बल से दूसरों की प्रतिष्ठा को नष्ट करता है, वह धर्म से च्युत हो जाता है और सत्य का पालन नहीं करता; इसलिए वह नाशवान लोकों को प्राप्त होता है ॥13॥
 
Agni says, "A Brahmin who, after studying, considers himself a great scholar and takes pride in his learning, and who by the power of his knowledge ruins the reputation of others, he is deviated from Dharma and does not follow the truth; hence he attains the perishable worlds. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)