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श्लोक 13.23.d8  |
भीष्म उवाच
ऋषिभिर्नारद: प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशय:।
धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान्॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्मजी कहते हैं- राजन! तब सभी ऋषियों ने मिलकर नारदजी से कहा- 'हे सत्यमुनि! आप कृपा करके उस विषय का वर्णन करें जिस पर मार्कण्डेयजी को संदेह है। क्योंकि आप धर्म और अधर्म सम्बन्धी समस्त संशय दूर करने में समर्थ हैं।' |
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| Bhishmaji says- King! Then all the sages together said to Naradji- 'O sage of truth! You please explain the matter on which Markandeyaji has doubts. Because you are capable of removing all doubts related to Dharma and Adharma.' |
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