मार्कण्डेय उवाच
एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते।
किं चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति॥
अनुवाद
मार्कण्डेय ने पूछा, "जब संसार में धर्म का लोप हो जाता है और अधर्म का बोलबाला हो जाता है, तब चारों वर्णों के लिए निर्धारित हव्य और कव्य का नाश क्यों नहीं होता?"
Mārkaṇḍeya asked, "When Dharma vanishes and Adharma prevails in the world, then why do the Havyā and Kavya meant for the four Varnas not get destroyed?"