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श्लोक 13.23.d1  |
(युधिष्ठिर उवाच
पुत्रै: कथं महाराज पुरुषस्तरितो भवेत्।
यावन्न लब्धवान् पुत्रमफल: पुरुषो नृप॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने पूछा, "हे मनुष्यों के स्वामी! महाराज! पुत्र प्राप्ति से मनुष्य का उद्धार कैसे होता है? पुत्र प्राप्ति के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ क्यों माना जाता है?" |
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| Yudhishthira asked- O Lord of men! Maharaj! How is a man saved by having sons? Why is a man's life considered fruitless until he has a son? |
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