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श्लोक 13.19.51-52h  |
एवमुक्त्वा तु भगवान् वरेण्यो वृषवाहन:।
महेश्वरो महाराज कृत्तिवासा महाद्युति:॥ ५१॥
सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत। |
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| अनुवाद |
| महाराज! ऐसा कहकर कृत्तिवास भगवान महेश्वर, महान तेज वाले, वृषभवाहन के वाहन और सब वर्णों में श्रेष्ठ, अपने गणों सहित वहाँ अन्तर्धान हो गए॥51 1/2॥ |
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| Maharaj! Having said this, Lord Maheshwar, the Krittivasa, the one with great effulgence, the vehicle of Vrishabhavahana and the best of all the colors, disappeared there along with his entourage. 51 1/2॥ |
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