श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 19: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान‍् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान‍् शिवजीकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  13.19.4-5h 
कपिलश्च तत: प्राह सांख्यर्षिर्देवसम्मत:।
मया जन्मान्यनेकानि भक्त्या चाराधितो भव:॥ ४॥
प्रीतश्च भगवान‍् ज्ञानं ददौ मम भवान्तकम्।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सांख्य के पूज्य आचार्य कपिल बोले - 'मैंने भी अनेक जन्मों तक भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान ने मुझे समस्त भय का नाश करने वाला ज्ञान प्रदान किया है।'
 
After that, the respected Acharya of Sankhya, Kapil, said - 'I too had worshiped Lord Shankar with devotion for many births. Pleased with this, God gave me the knowledge that destroys all fear. 4 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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