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श्लोक 13.19.2  |
पुरा पुत्र मया मेरौ तप्यता परमं तप:।
पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषोऽनुकीर्तित:॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| पुत्र! महाराज! पूर्वकाल की बात है, मैंने पुत्र प्राप्ति के लिए मेरु पर्वत पर घोर तप किया था। उस समय मैंने इस स्तोत्र का अनेक बार पाठ किया था॥ 2॥ |
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| Son! Maharaj! It is a matter of the past, I had performed a great penance on Mount Meru to get a son. At that time I had recited this stotra many times.॥ 2॥ |
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