श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 19: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान‍् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान‍् शिवजीकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.19.2 
पुरा पुत्र मया मेरौ तप्यता परमं तप:।
पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषोऽनुकीर्तित:॥ २॥
 
 
अनुवाद
पुत्र! महाराज! पूर्वकाल की बात है, मैंने पुत्र प्राप्ति के लिए मेरु पर्वत पर घोर तप किया था। उस समय मैंने इस स्तोत्र का अनेक बार पाठ किया था॥ 2॥
 
Son! Maharaj! It is a matter of the past, I had performed a great penance on Mount Meru to get a son. At that time I had recited this stotra many times.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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