Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.188.51-52: ऐसा कहकर बुद्धिमान भीष्मजी ने अपने समस्त मित्रों को गले लगाया और युधिष्ठिर से पुनः इस प्रकार कहा - 'युधिष्ठिर! तुम्हें सर्वसाधारण ब्राह्मणों की, विशेषतः विद्वानों, आचार्यों और ऋत्विजों की सदैव पूजा करनी चाहिए ॥51-52॥   |   mahabharat अध्याय 13.188: भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 188: भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  13.188.51-52 
इत्युक्त्वा सुहृद: सर्वान् सम्परिष्वज्य चैव ह।
पुनरेवाब्रवीद् धीमान् युधिष्ठिरमिदं वच:॥ ५१॥
ब्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषत:।
आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीया जनाधिप॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर बुद्धिमान भीष्मजी ने अपने समस्त मित्रों को गले लगाया और युधिष्ठिर से पुनः इस प्रकार कहा - 'युधिष्ठिर! तुम्हें सर्वसाधारण ब्राह्मणों की, विशेषतः विद्वानों, आचार्यों और ऋत्विजों की सदैव पूजा करनी चाहिए ॥51-52॥
 
Saying this, the wise Bhishmaji embraced all his friends and again said to Yudhishthir thus - 'Yudhishthir! You should always worship all Brahmins in general, especially scholars and Acharyas and Ritvijas. 51-52॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्मविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)