श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 188: भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  13.188.48 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेय: पाण्डवानिदमब्रवीत्।
धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! भगवान के ऐसा कहने पर गंगानन्दन भीष्म ने पाण्डवों और धृतराष्ट्र आदि सभी मित्रों से कहा-॥ 48॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On God saying this, Ganganandan Bhishma said to all the friends like Pandavas and Dhritrashtra -॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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