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mahabharat 13.185.6: काल किसी भी प्रकार धर्म को अधर्म में नहीं बदल सकता, अर्थात् धर्म का आचरण करने वाले को दुःख नहीं पहुँचा सकता। अतः धर्म का आचरण करने वाले को शुद्धात्मा समझना चाहिए ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 13.185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.185.6 
न ह्यधर्मतयाधर्मं दद्यात् काल: कथंचन।
तस्माद् विशुद्धमात्मानं जानीयाद् धर्मचारिणम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
काल किसी भी प्रकार धर्म को अधर्म में नहीं बदल सकता, अर्थात् धर्म का आचरण करने वाले को दुःख नहीं पहुँचा सकता। अतः धर्म का आचरण करने वाले को शुद्धात्मा समझना चाहिए ॥6॥
 
Time cannot turn Dharma into Adharma in any way, i.e. it cannot cause pain to the person who practices Dharma. Therefore, a person who practices Dharma should be considered a pure soul. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)