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mahabharat 13.183.42: जो व्यक्ति मासिक धर्म के समय के अतिरिक्त किसी स्त्री के समीप नहीं जाता, उसके आचरण को ब्रह्मचर्य कहते हैं। अमृत, ब्राह्मण और गौ - ये तीनों एक ही स्थान से प्रकट हुए हैं। अतः मनुष्य को सदैव गौ और ब्राह्मण की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। 42.   |   mahabharat अध्याय 13.183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.183.42 
नान्यदा गच्छते यस्तु ब्रह्मचर्यं च तत् स्मृतम्।
अमृतं ब्राह्मणा गाव इत्येतत् त्रयमेकत:।
तस्माद् गोब्राह्मणं नित्यमर्चयेत यथाविधि॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति मासिक धर्म के समय के अतिरिक्त किसी स्त्री के समीप नहीं जाता, उसके आचरण को ब्रह्मचर्य कहते हैं। अमृत, ब्राह्मण और गौ - ये तीनों एक ही स्थान से प्रकट हुए हैं। अतः मनुष्य को सदैव गौ और ब्राह्मण की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। 42.
 
The behaviour of one who does not approach a woman except during her menstrual period is called celibacy. Amrit, Brahmin and cow – these three have appeared from the same place. Therefore, one should always worship cow and Brahmin in a proper manner. 42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)