श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.183.33 
युधिष्ठिर उवाच
असतां कीदृशं रूपं साधव: किं च कुर्वते।
ब्रवीतु मे भवानेतत् सन्तोऽसन्तश्च कीदृशा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! तपस्वी का स्वरूप कैसा होता है? पुण्यात्मा पुरुष किस प्रकार के कर्म करते हैं? पुण्यात्मा और तपस्वी कैसे होते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।"
 
Yudhishthira asked, "Grandfather! What is the form of an ascetic? What kind of deeds do virtuous men do? How are virtuous and ascetic? Please tell me this."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)