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mahabharat 13.182.16: जो मनुष्य भगवान शंकर की मूर्ति या लिंग की पूजा करता है, वह लिंग-पूजक सदैव अपार धन का भागी होता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 13.182: भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.182.16 
विग्रहं पूजयेद् यो वै लिङ्गं वापि महात्मन:।
लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य भगवान शंकर की मूर्ति या लिंग की पूजा करता है, वह लिंग-पूजक सदैव अपार धन का भागी होता है ॥16॥
 
The person who worships the idol of Lord Shankar or the Linga, that Linga-worshipper always becomes a part of immense wealth. ॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)