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श्लोक 13.180.40-41  |
यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति॥ ४०॥
त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्टॺं प्रतिपत्स्यसे।
सुप्रिय: सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| ‘जब तक तीनों लोकों में आपकी पुण्य कीर्ति रहेगी, तब तक आप तीनों लोकों में प्रधान रहेंगे। जनार्दन! आप सब लोगों में सबसे प्रिय होंगे। ॥40-41॥ |
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| ‘As long as your pious fame lasts in the three worlds, you will remain the chief in the three worlds. Janardan! You will be the most beloved of all people. ॥ 40-41॥ |
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