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mahabharat 13.180.39-40h: पिताजी! मेरे सुख का भविष्य में जो फल होगा, उसे विस्तार से सुनिए। जब ​​तक देवताओं और मनुष्यों को भोजन प्रिय रहेगा, तब तक आपके प्रति भी भोजन के प्रति उनकी भावना और आकर्षण वैसा ही बना रहेगा।'   |   mahabharat अध्याय 13.180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 39-40h
 
 
श्लोक  13.180.39-40h 
प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधि।
यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति॥ ३९॥
यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति।
 
 
अनुवाद
पिताजी! मेरे सुख का भविष्य में जो फल होगा, उसे विस्तार से सुनिए। जब ​​तक देवताओं और मनुष्यों को भोजन प्रिय रहेगा, तब तक आपके प्रति भी भोजन के प्रति उनकी भावना और आकर्षण वैसा ही बना रहेगा।'
 
‘Father! Listen to the future result of my happiness in detail. As long as the gods and humans love food, the feelings and attraction they have for food will remain the same for you. 39 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)