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mahabharat 13.18.93: 516 उपकार:—कल्याण करने वाला, 517 प्रिय:—भक्तों का प्रिय, 518 सर्व:—सबका स्वरूप, 519 कनक:—सुनहरा रूप, 520 कांचनछवी:—कांच के समान चमक वाली, 521 नाभि:—संपूर्ण जगत का मध्य रूप, 522 नंदीकर:—आनंद देने वाला, 523 भव:—भक्ति का रूप, 524 पुष्करस्थापति:—ब्रह्मांड रूपी पुष्कर को उत्पन्न करने वाला, 525 स्थिर:—स्थिर रूप।   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  13.18.93 
उपकार: प्रिय: सर्व: कनक: काञ्चनच्छवि:।
नाभिर्नन्दिकरो भाव: पुष्करस्थपति: स्थिर:॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
516 उपकार:—कल्याण करने वाला, 517 प्रिय:—भक्तों का प्रिय, 518 सर्व:—सबका स्वरूप, 519 कनक:—सुनहरा रूप, 520 कांचनछवी:—कांच के समान चमक वाली, 521 नाभि:—संपूर्ण जगत का मध्य रूप, 522 नंदीकर:—आनंद देने वाला, 523 भव:—भक्ति का रूप, 524 पुष्करस्थापति:—ब्रह्मांड रूपी पुष्कर को उत्पन्न करने वाला, 525 स्थिर:—स्थिर रूप।
 
516 Upkaar:—one who does good, 517 Priya:—loving of the devotees, 518 Sarva:—all in form, 519 Kanak:—golden form, 520 Kanchanchhavi:—one with a lustrous luster like glass, 521 Nabhi:—the central form of the entire world, 522 Nandikar:—one who gives joy, 523 Bhava:—form of devotion, 524 Pushkarsthapati:—the creator of Pushkar in the form of the universe, 525 Sthir:—stable form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)