गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च।
अथर्वशीर्ष: सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षण:॥ ९१॥
अनुवाद
502 गण्डाली: जो पर्वतों की गुफाओं में छिपे रहते हैं, 503 मेरुधाम: जो मेरु पर्वत को अपना निवास बनाते हैं, 504 देवाधिपति:—देवताओं के स्वामी, 505 अथर्वशीर्ष:—जिनका मुख अथर्ववेद है, 506 समास्य:—जिनका मुख सामवेद है, 507 ऋग्सहस्रमितेक्ष:—जिनके नेत्र सहस्रों स्तोत्र हैं।॥91॥
502 Gandali: One who lives hidden in the caves of the mountains, 503 Merudhama: One who makes Mount Meru his abode, 504 Devadhipati:—Lord of the gods, 505 Atharvashirsa:—One whose head is Atharvaveda, 506 Samasya:—One whose mouth is Samveda, 507 Rigsahasramiteksha:—One whose eyes are thousands of hymns.॥91॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥