श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  13.18.90 
स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनि:।
वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहन:॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
494 स्नेहन: - पिता के समान प्रजा में स्नेह रखने वाले, 495 अस्नेहन: - आसक्ति से रहित, 496 अजित: - किसी से पराजित न होने वाले, 497 महामुनि: - अत्यंत मननशील, 498 वृक्षक: - संसार वृक्ष के समान, 499 वृक्षकेतु: - वृक्ष के समान ऊँची ध्वजा वाले, 500 अनल: - अग्निस्वरूप, 501 वायुयान: - जो वायु को वाहन की तरह उपयोग करते हैं । 90॥
 
494 Snehan:—having affection for the subjects like a father, 495 Asnehan:—free from attachment, 496 Ajit:—not defeated by anyone, 497 Mahamuni:—extremely contemplative, 498 Vrikshaak:—world tree in form, 499 Vrikshaketu:—having a flag as high as a tree, 500 Anal:—in the form of fire, 501 Air vehicles:-those who use air as vehicles. 90॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)