Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.18.83: 439 वृषाण:—धर्म के स्वरूप, कर्मफलों की वर्षा करने वाले, 440 शंकर:—कल्याण करने वाले, 441 सदा प्रभुत्वशाली—जो सदैव चमकते रहते हैं, 442 धूमकेतन:—अग्नि स्वरूप, 443 नील:—काले रंग वाले श्रीहरि, 444 अंगलुबद्ध:—जो अपने शरीर की सुन्दरता से स्वयं मोहित हो जाते हैं, 445 शोभन:—सुंदर, 446 निरवग्रह:—बिना किसी बंधन के । 83॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  13.18.83 
वृषण: शङ्करो नित्यं वर्चस्वी धूमकेतन:।
नीलस्तथाङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रह:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
439 वृषाण:—धर्म के स्वरूप, कर्मफलों की वर्षा करने वाले, 440 शंकर:—कल्याण करने वाले, 441 सदा प्रभुत्वशाली—जो सदैव चमकते रहते हैं, 442 धूमकेतन:—अग्नि स्वरूप, 443 नील:—काले रंग वाले श्रीहरि, 444 अंगलुबद्ध:—जो अपने शरीर की सुन्दरता से स्वयं मोहित हो जाते हैं, 445 शोभन:—सुंदर, 446 निरवग्रह:—बिना किसी बंधन के । 83॥
 
439 Vrushan:—the embodiment of religion, who showers the fruits of karma, 440 Shankar:—the doer of welfare, 441 the ever-dominant—who always shines brightly, 442 Dhumketan:—the embodiment of fire, 443 Neel:—the dark-coloured Sri Hari, 444 Anglubdha:—the one who is himself wooed by the beauty of his body, 445 Shobhan:—graceful, 446 Niravgrah:—without restrictions. 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)