Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.18.52: 184 अदर्शन:—अजेय, 185 दर्शनात्मा—भय का रूप, 186 यज्ञहा—दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाला, 187 कामनानाशक:—कामदेव को नष्ट करने वाला, 188 दक्षयागपहारी—दक्ष के यज्ञ का हरण करने वाला, 189—सुसह:—अत्यंत सहनशील, 190 मध्यम:—मध्यस्थ। 52॥ | mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशक:।
दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा॥ ५२॥
अनुवाद
184 अदर्शन:—अजेय, 185 दर्शनात्मा—भय का रूप, 186 यज्ञहा—दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाला, 187 कामनानाशक:—कामदेव को नष्ट करने वाला, 188 दक्षयागपहारी—दक्ष के यज्ञ का हरण करने वाला, 189—सुसह:—अत्यंत सहनशील, 190 मध्यम:—मध्यस्थ। 52॥
184 Adharshana:—invincible, 185 Dharshanatma—form of fear, 186 Yajnaha—destroyer of Daksh's yagya, 187 Kamanashak:—destroyer of Kamadeva, 188 Dakshayaagapahari—one who kidnaps Daksha's yagya, 189—Susah:—very tolerant, 190 Madhyam:—mediator. 52॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥