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mahabharat 13.18.38: 63 चन्द्र:—चन्द्रमा के रूप में सुखदायक, 64 सूर्य:—सबकी उत्पत्ति के कारण सूर्य, 65 शनि:—, 66 केतु:—, 67 ग्रह:—चन्द्रमा और सूर्य को ग्रहण करने वाले राहु, 68 ग्रहपति:—ग्रहों के रक्षक, 69 वर:—वरणीय, 70 अत्रि:—अत्रि ऋषि रूप, 71 अत्रिय नमस्कार—त्रिगुण पत्नी अनसूया को। जो दुर्वासा के रूप में नमस्कार करते हैं, 72 मृगबाणार्पण:—जो मृग के रूप में यज्ञ पर बाण चलाते हैं, 73 अनघ:—पापरहित। 38॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  13.18.38 
चन्द्र: सूर्य: शनि: केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वर:।
अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघ:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
63 चन्द्र:—चन्द्रमा के रूप में सुखदायक, 64 सूर्य:—सबकी उत्पत्ति के कारण सूर्य, 65 शनि:—, 66 केतु:—, 67 ग्रह:—चन्द्रमा और सूर्य को ग्रहण करने वाले राहु, 68 ग्रहपति:—ग्रहों के रक्षक, 69 वर:—वरणीय, 70 अत्रि:—अत्रि ऋषि रूप, 71 अत्रिय नमस्कार—त्रिगुण पत्नी अनसूया को। जो दुर्वासा के रूप में नमस्कार करते हैं, 72 मृगबाणार्पण:—जो मृग के रूप में यज्ञ पर बाण चलाते हैं, 73 अनघ:—पापरहित। 38॥
 
63 Chandra:—pleasing in the form of the moon, 64 Surya:—Sun, the cause of the origin of all, 65 Shani:—, 66 Ketu:—, 67 Graha:—Rahu who eclipses the Moon and the Sun, 68 Grahapati:—guardian of the planets, 69 Var:—varaniya, 70 Atri:—Atri sage form, 71 Atriya namaskara—to triple wife Anasuya. Those who salute in the form of Durvasa, 72 Mrigabanarpan:—Those who shoot arrows at the Yagya in the form of deer, 73 Anagh:—Sinless. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)