श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  13.18.164 
जन्मकोटिसहस्रेषु नानासंसारयोनिषु।
जन्तोर्विगतपापस्य भवे भक्ति: प्रजायते॥ १६४॥
 
 
अनुवाद
जब जीव करोड़ों जन्मों तक नाना प्रकार की सांसारिक योनियों में भटकने के बाद पापों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, तब उसे भगवान शिव की भक्ति प्राप्त होती है ॥164॥
 
When a living being becomes completely free from sins after wandering in different types of worldly births for millions of births, then he has devotion to Lord Shiva. 164॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)