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mahabharat 13.18.134: 851 ब्रह्मदण्डविनिर्मित - ब्रह्मदण्ड के रचयिता, 852 शतघ्नीपाशशक्तिमान् - शतघ्नी, पाश और शक्ति से युक्त, 853 पद्मगर्भ: - ब्रह्मा के स्वरूप, 854 महागर्भ: - जगत् के गर्भ को धारण करने वाले होने के कारण महागर्भ, 855 ब्रह्मगर्भ: - उदर में वेदों को धारण करने वाले, 856 जलोद्भव: - एकार्णव के। जो जल में प्रकट होते हैं ॥134॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  13.18.134 
ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान्।
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भव:॥ १३४॥
 
 
अनुवाद
851 ब्रह्मदण्डविनिर्मित - ब्रह्मदण्ड के रचयिता, 852 शतघ्नीपाशशक्तिमान् - शतघ्नी, पाश और शक्ति से युक्त, 853 पद्मगर्भ: - ब्रह्मा के स्वरूप, 854 महागर्भ: - जगत् के गर्भ को धारण करने वाले होने के कारण महागर्भ, 855 ब्रह्मगर्भ: - उदर में वेदों को धारण करने वाले, 856 जलोद्भव: - एकार्णव के। जो जल में प्रकट होते हैं ॥134॥
 
851 Brahmdandvinirmata—creator of Brahmdanda, 852 Shataghnipaashshaktiman—full of Shataghni, loop and power, 853 Padmagarbha:—in the form of Brahma, 854 Mahagarbha:—Mahagarbha because of being the one who holds the womb of the world, 855 Brahmagarbha:—one who holds the Vedas in the stomach, 856 Jalodbhava:—of Ekarnava. Those who appear in water. 134॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)