श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  13.18.122 
शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षित:।
अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबल:॥ १२२॥
 
 
अनुवाद
757 विमर्शः शिरोहरि - जो विवेकपूर्वक दुष्टों के सिर काटता है, 758 सर्वलक्षणलक्षितः - समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, 759 अक्षः रथयोगी - जो रथ से संबंधित है, 760 सर्वयोगी - जो सब समय योग करने में समर्थ है, 761 महाबलः - जो अनंत शक्ति से युक्त है । 122॥
 
757 Vimarsh: Shirohari - one who cuts the heads of the wicked with discretion, 758 Sarvlakshanlakshit: - endowed with all the auspicious traits, 759 Aksha: Rathayogi - one who is related to the chariot, 760 Sarvayogi - capable of doing yoga at all times, 761 Mahabal: - endowed with infinite power. 122॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)