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mahabharat 13.18.121: 749 आषाढ़:—भक्तों को सब कुछ सहने की शक्ति देने वाले, 750 सुषाढ़:—उत्तम सहनशील, 751 ध्रुव:—अपरिवर्तनशील रूप, 752 हरिन:—शुद्ध रूप, 753 हर:—पापी, 754 आवर्तमनेभ्यो वपु:—स्वर्ग से लौटनेवाले को नया शरीर देने वाले, 755 वसुश्रेष्ठ:—उत्तम ऐश्वर्य रूप अर्थात् मोक्ष रूप, 756 महापथ:—उत्तम मार्ग । 121॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  13.18.121 
आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हर:।
वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथ:॥ १२१॥
 
 
अनुवाद
749 आषाढ़:—भक्तों को सब कुछ सहने की शक्ति देने वाले, 750 सुषाढ़:—उत्तम सहनशील, 751 ध्रुव:—अपरिवर्तनशील रूप, 752 हरिन:—शुद्ध रूप, 753 हर:—पापी, 754 आवर्तमनेभ्यो वपु:—स्वर्ग से लौटनेवाले को नया शरीर देने वाले, 755 वसुश्रेष्ठ:—उत्तम ऐश्वर्य रूप अर्थात् मोक्ष रूप, 756 महापथ:—उत्तम मार्ग । 121॥
 
749 Aashadh:—one who gives strength to the devotees to bear everything, 750 Sushadh:—best tolerant, 751 Dhruva:—unchangeable form, 752 Harin:—pure form, 753 Har:—sinner, 754 Avartamanebhyo Vapu:—one who gives a new body to the one returning from heaven, 755 Vasushrestha:—best form of wealth i.e. form of liberation, 756 Mahapath:—The best path. 121॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)